Monday, June 26, 2017

कुछ छूट गया

करने को बहुत है और समय है बहुत कम
कुछ न कुछ छूट ही जाता है
अब छूट ही गया तो ऐसा भी कुछ नहीं
न शोर हुआ, न धमाका हुआ और
न दुनिया ही रुकी
फिर भी अपराध-बोध होता है कि
कुछ छूट गया
बहुत दिनों से यह चिट्ठा छूटा हुआ है।

Sunday, October 23, 2016

प्रजातंत्र  का धर्म और धर्म का प्रजातंत्र


आगे बढ़ने से पहले प्रजातंत्र  और धर्म इन दोनों शब्दों को समझना आवश्यक है। प्रजातंत्र का 
शाब्दिक अर्थ है प्रजा का तंत्र। तंत्र का यहाँ व्यापक अर्थ है। याने एक ऐसी व्यवस्था जो प्रजा ने 
स्वयं के लिये निर्धारित की हो। एक ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें प्रजा अपना ‘राजा’ खुद चुनती है। राजा यहाँ राजा न हो कर प्रजा यानी जनता का प्रतिनिधि होता है। जनता के आदेश से जनता का शासक बनता है।  अब्राहम लिंकन ने प्रजातंत्र को इस तरह परिभाषित किया था,  जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा शासन। प्रजातंत्र में कानून की नजर में सब बराबर हैं। सबको समान रूप से अभिव्यक्ति की आजादी है। विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, अल्पसंख्यकों को समानाधिकार प्राप्त हैं।  शासनतंत्र घोषितरूप से धर्मनिरपेक्ष रहता है। पर शासनतंत्र धर्मनिरपेक्ष रह पाता है या नहीं या किस सीमा तक धर्मनिरपेक्ष है, यह इस पर निर्भर करता है कि प्रजातंत्र कितना विकसित हुआ है या कितना परिपक्व है।
प्रजातंत्र के कई स्वरूप हैं, पर मूल सिद्धांत वही है, जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा शासन। प्रजातंत्र में साधारणतया प्रतिनिधि एक निश्चित अवधि के लिये जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं और उन्हें जनहित हेतु नीतियाँ बनाने की स्वतंत्रता होती है। नियमित अंतराल पर चुनाव प्रतिनिधियों पर अंकुश का काम करता है। जो देश-समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं वे चुनाव द्वारा शासन तंत्र में आते हैं। उनका अगली बार चुना जाना या न चुना जाना इस पर निर्भर करता है कि जनता उनके कार्य की गुणवत्ता को कैसे परखती है। ध्येय से भटकने वाले प्रतिनिधियों को जनता अपने मतदान से सत्ता से बाहर कर सकती है।

अब आते हैं धर्म की व्याख्या पर। एक धर्म  होता है मानवोचित व्यवहार से जुड़ा हुआ और एक होता है ईश्वरीय आस्था से जुड़ा हुआ। व्यापक अर्थ में ईश्वरीय आस्था से जुड़ा हुआ धर्म मानवोचित व्यवहार से जुड़े हुए धर्म से भिन्न नहीं हो सकता। पर चूँकि ईश्वर की मान्यताएँ अलग-अलग हैं और उनसे जुड़े धर्म अलग-अलग है. तो धर्म की परिभाषा स्पर्धा की भावना में लिप्त हो कर संकीर्ण हो जाती है।
पद्मपुराण में धर्म की व्याख्या इस प्रकार है,   
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। 
अर्थात धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो ! और सुनकर इसका अनुगमन करो। जो आचरण स्वयं के प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये। इस परिभाषा के अंतर्निहित अर्थ का अनुगमन किया जाये तो प्रजातंत्र  का धर्म बनता है –
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।
अर्थात सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।  विस्तार में न जा कर यहाँ यह कहना श्रेयस्कर होगा कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में सभी अपने-अपने धर्मों का अनुसरण करते हुए, सुख शान्ति से जीवनयापन करते हुए उन्नति की ओर अग्रसर हों। यही प्रजातंत्र  का धर्म है। जब हम प्रजातंत्र के धर्म की बात करते हैं तो हम मानवोचित व्यवहार से जुड़े हुए धर्म की ही बात कर रहे होते हैं।

अब आते हैं धर्म के प्रजातंत्र  की ओर। यहाँ पर मानवोचित व्यवहार से जुड़ा हुआ धर्म यानी प्रजातंत्र  का धर्म गौण हो जाता है और ईश्वरीय आस्था से जुड़ा हुआ धर्म मुख्य धारा में आ जाता है। कहा जा चुका है कि प्रजातंत्र की व्यवस्था के अनुसार प्रजातंत्र में विभिन्न धर्मावलंबियों को समानाधिकार मिलता है। एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में सभी धर्म के अनुयायी अपने-अपने धार्मिक नियम-सिद्धांतों का अनुकरण करने के लिये स्वतंत्र हैं। प्रजातंत्र  में एक  कमजोरी यह है कि जनता का प्रतिनिधि अक्सर गुणवत्ता नहीं वरन् जाति और धर्म के आधार पर चुना जाता है जिससे अवांछनीय तत्व सत्ता में आ जाते हैं। ऐसे तत्व अपनी साख बनाये रखने के लिये अपनी प्रजा को अँधेरे में रखते हैं। धर्मनिरपेक्षता का हवाला दे कर धर्म की कुप्रथाओं को हवा देते हैं और उनकी उन्नति नहीं होने देते। यहाँ तक कि ऐसे सत्ता के लोलुप, धर्म को राष्ट्र से बड़ा बना देते हैं। जहाँ किसी जाति या धर्मानुयायियों का उत्थान नहीं होता वहाँ घेटो (ghetto) मानसिकता पनपती है जो उन्नति के द्वार बंद कर देती है। जहाँ प्रजातंत्र  का धर्म सुख समृद्धि लाता है वहीं धर्म का प्रजातंत्र  अराजकता फैलाता है।

धर्म का उद्देश्य वस्तुतः आचरण की शुचिता का उन्नयन करना है जिसके लिये ईश्वरीय गुणों की परिकल्पना को अनुसरण योग्य आदर्शों के रूप में स्वीकार किया जाता है। अतः यह सर्वजन हिताय है। प्रजातंत्र का धर्म भी सर्वजन हिताय है। स्पष्ट है कि धर्म और प्रजातंत्र के मूल उद्देश्यों में कहीं टकराव नहीं है। प्रजातंत्र तो तब कुत्सित हो जाता है जब तथाकथित धर्म की स्वार्थपरक एवं संकुचित परंपराएँ जनतंत्र के निहितार्थ को  नियमित करने लगती हैं।
धर्म और प्रजातंत्र दोनों स्वयं में दोषमुक्त हैं परंतु विडंबना है कि मनुष्य मात्र जिनके लिये इनका आविर्भाव हुआ है इनके अनुगमन में पर्याप्त सावधानी नहीं बरतते। सत्य निष्ठा से किसी भी धर्म का पालन निर्वाण की ओर ले जाता है। इसी प्रकार प्रजातंत्र के आदर्शों का पालन एक सुखी और सम्पन्न समाज की रचना करता है। परंतु जिन्हें उनके निर्वहन का उतरदायित्व सौंपा गया है, उनको चारित्रिक दृढता से सिद्धांतों का अनुपालन करना चाहिए तभी धर्म एवं प्रजातंत्र वास्तव में एक दूसरे के पूरक होंगे न कि शत्रु।
समाप्त



Thursday, January 22, 2015

आज नुक्कड़ पर बम फटा था


आज नुक्कड़ पर बम फटा था
कुछ जानें गई थीं
सड़क पर खून बिखरा था

टीवी चैनलों में, जींस पहने हाथ में माइक लिए रिपोर्टर
बारबार दिखा रहे थे
सड़क पर कुछ लावारिश जूते, चप्पल
और रोते दहाड़ते हुए परिजन

दहशत का माहौल था
अब और भी गाढ़ा हो चला था
डर लग रहा था

उनका इलाका था पर जाना था जरूरी
जेब में चाकू रख लिया कि क्या पता
सुनसान गली सहमा सहमा सा मैं
घड़कते दिल से
अपने को समेटे चला जा रहा था मैं
तभी मेरे पीछे किसी के चलने की सी आवाज आई
चप... चप... चप... चप

मेरी तो जान साँसत में फँस गई
मैंने कदम तेज कर दिये तो आवाज भी तेज हो गई
चप – चप – चप - चप
मैं  रुका तो आवाज भी रुकी
डर के मारे मेरी घिघ्घी बँध गई
मैंने लैंप पोस्ट की आड़ ली
पीछे देखा, एक लंबा-चौड़ा हट्टा-कट्ठा आदमी
मैं पसीने-पसीने

सोचा आज तो मैं तो गया
मेरा छोटा-सा चाकू क्या कर लेगा इसके सामने
मुझे तो ठीक से चाकू  पकड़ना भी नहीं आता
कैसे मारेगा वह मुझे
क्या पता वह पीछे से चाकू फैंकेगा
या पकड़ कर गला रेतेगा

नहीं नहीं वह ऐसे कैसे कर सकता है
कैसे मार सकता है
वह जरूर पहले पता करने की कोशिश करेगा कि
मैं उसके धर्म का हूँ या नहीं

यदि न निकला तो
अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी थी मेरे सामने
अपने को बचाने के लिए मैं दौड़ पड़ा
मेरे पीछे वह भी दौड़ेने लगा
ठोकर लगी मैं गिर पड़ा
वह मेरे ऊपर झुका
उसकी आँखें लाल-लाल
चेहरा खूँखार
उसने मेरा हाथ पकड़ा
मुझे झटके से उठाया और बोला
नुक्कड़ पर बम फटा है
मैंने देखा आप सड़क पर सहमे-सहमे जा रहे हैं
मुझे इस सुनसान सड़क पर मुझे डर लग रहा है
मैं शहर में नया हूँ
मैं आपके साथ बस स्टॉप तक चलूँ क्या
एक से दो भले

मेरी जान में जान आई
मैंने राहत की साँस ली
लगा अभी मानवता बाकी है
इन्सानियत से भरोसा नहीं उठा है
पर किस का भरोसा
मेरा या उसका !

आज नुक्कड़ पर बम फटा था
कुछ जानें गई थीं
सड़क पर खून बिखरा था

Sunday, March 27, 2011

प्रेमिका संवाद -5 (अंतिम किस्‍त )

प्रेमिका संवाद -5

अब तक आपने पढ़ा
प्रेमिका संवाद -1 प्रेमिका संवाद -2 प्रेमिका संवाद - 3 प्रेमिका संवाद - 4

अब आगे-

प्रेमाशिष का मुँह खुल गया। चेहरे पर बेवकूफों सा भाव लिये वह सरला की ओर देखने लगा।

'प्रेम,' सरला उसी रौ में कहती गई, 'किसी भी व्यक्ति में कम से कम थोड़ा तो आत्मसंयम होना चाहिए। जिस लड़की को अभी तुम अपने जाल में फाँस रहे थे , मैंने सुना है कि उसकी सगाई हो चुकी है। मानवता के नाते थोेड़ी तो मानवता दिखाओ। दूसरों की मँगेतरों को तो छोड़ दो।'

प्रेमाशिष के चेहरे के भावों में थोड़ा परिवर्तन हुआ। वह और भी अधिक बेवकूफ लगने लगा।

सरला ने अपना कर्तव्य समझ कर इतना कह तो दिया,पर यह उसके लिये बहुत कष्टदायक सिद्ध हुआ। प्रेम को देख कर, उसके सम्मुख खड़े हो कर बातें करते समय उसका सारा संयम रेत की दीवार की तरह ढहने लगा। बड़ी कठिनाई से उसने अपने को सँभाला। स्वयं को संयत करने के लिये वह बाथरूम की ओर चली गई।

उसे हर हाल में अपने को सँभालना होगा। अभी तो लंबा जीवन उसके सामने है। जीवन के सूखे और कंटकाकीर्ण पथ में ऐसे झटके, अब लगता है मील के पत्थर की तरह आते रहेंगे। उसे सदा सचेत रहना पड़ेगा कि कभी जब प्रेम पास हो तो वह किसी भी क्षणिक कमजोरीवश कही ऐसा न कर दे जैसा उसने नहीं करने का प्रण लिया है। जानबूझ कर तो मक्खी नहीं निगली जाती। फिर उसका आत्मसम्मान भी तो है।

उधर प्रेमाशिष ने मुँह में रखे आलू दम के टुकड़े को जैसे-तैसे उदर में पहुँचाया। उस आलू में अब कोई दम न था। विनोद ने मदन को देखा तो वह एक गिलास पानी ले कर उसके पास पहुँच गया। उसने कहा,

'लो, यह पानी पी लो। ठीक हो जायेगा।'

'काश, हमारी सभी समस्याएँ पानी पीने से ठीक हो जातीं!' प्रेमाशिष ने सोचा। पर उसके मुँह से निकला, 'आँ...।'

'मैं तुमको वहाँ से देख रहा था। तुम्हारा चेहरा देख कर समझ गया कि तुम्हारे गले में कुछ अटक गया है।' विनोद ने कहा।

'आँ...गाँ...।' प्रेमाशिष ने कहा।

कहा जा चुका है कि टीले वाला मकान पार्क का सबसे बड़ा मकान है। उसमें कमरे ही कमरे हैं। नया आदमी तो इन कमरों की भूलभुलैया में भटक कर रह जाय। घर की मालकिन की कृपा से सरला बाथरूम तक पहुँच गई थी। जब वह निकली तो वह अपने हिसाब से उसी ओर बढ़ी जहाँ पार्टी चल रही थी। पर पहुँची एक बड़े लंबे चौड़े गलियारे में, जिसके दोनों ओर पर्दे लगे दरवाजे थे। कुछ देर तो वह पशोपेश में रही कि किस पर्दे को हटा कर अंदर जाए। स्थिति ऐसी थी कि देवकीनंदन खत्री जी होते उसकी जगह, तो वे भी सिर खुजलाने लगते। फिर जो दरवाजा पास था उसी का पर्दा हटा कर वह अंदर घुस गई। यह कोई और ही कमरा था। इस कमरे में मदन एक सोफे में धँसा सिगरेट पी रहा था। संयोग से मदन का मुँह दूसरी ओर था। वह उल्टे पाँव वापस लौट ही रही थी कि दूसरे दरवाजे से शीला कमरे में आई और मदन को संबोधित कर कहने लगी, 'लो तुम यहाँ छिपे हो। चलो, चलते हैं।'

'तुम जाओ। मैं अभी बैठूँगा। आज छुट्टी है, फिर प्रेम भी साथ में है।' मदन ने कहा।

'तुम्हारा दोस्त प्रेम बहुत दुखी व्यक्ति है।' शीला ने कहा। 'वह अभी तक सरला से प्यार करता है।'

'मुझे मालूम है।' मदन ने कहा। 'ऐसे में कोई कुछ नहीं कर सकता है। कुछ मामले आदमी को स्वयं सुलझाने पड़ते हैं।'

'मदन, अभी मेरी बहुत देर तक प्रेम से बातचीत हुई। उसने टीक से तो कुछ नहीं बताया, पर मुझे लगता है कि सरला गलती कर रही है। उसे यदि अंदाज हो जाय कि प्रेम उसे प्रेम करता है तो शायद दो बिछड़े मिल जाएँ।' सरला ने कहा।

पर्दे के पीछे खड़ी सरला ने सोचा, 'तो वह शीला के संबंध में गलती कर रही थी शायद, क्योंकि शीला का मँगेतर प्रेमाशिष का ही मित्र मदन लग रहा था। पर इससे क्या अंतर पड़ता है! चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता, सब के बारे में तो वह गलती नहीं कर सकती।

'यह मुश्किल है।' मदन ने कहा। 'क्यों कि सरला को विश्वास है कि प्रेम उससे प्रेम करता है।'

'फिर...फिर...'

'उसे यह भी विश्वास है कि प्रेम सरला के साथ-साथ शहर की उन सभी लड़कियों को प्यार करता है जो अविवाहित हैं।'

'ऐसा कैसे हो सकता है?' शीला ने पूछा।

'सरला ऐसा ही सोचती है। सरला क्या, प्रेम को जानने वाले सभी यही सोचेंगे। क्यों कि उसका पिछला रिकार्ड ही ऐसा है।' मदन ने कहा।

'मदन, तुम अपने मित्र को अधिक जानते हो। पर मुझे तो लगता है कि प्रेम सरला से ही प्रेम करता है। यदि ऐसा है तो पहले की लड़कियों से छेड़छाड़ कोई महत्व नहीं रखती।' शीला न कहा।

क्या सचमुच ऐसा संभव है? सरला सोचने लगी। पर वह अपने विचारों में कायम नहीं रह पायी। कोई खटका हुआ। उसका ध्यान अपनी वर्तमान परिस्थिति पर आ गया। वह वहाँ से हट गयी।

गलियारे के दूसरे छोर पर उसे प्रसाद खड़ा दिखाई पड़ा। उसके खड़े होने का अंदाज बता रहा था कि हम यहाँ यूँ ही खड़े नहीं हैं। उसकी लंबी पतली गर्दन में उसका आवश्यकता से अधिक उभरा हुआ टेंटुआ जिस हिसाब से ऊपर नीचे हो रहा था उससे उसकी मानसिक हलचल का पता चलता था। यदि टेंटुआधारी व्यक्ति के चेहरे से गंभीरता टपक सकती है तो प्रसाद के चेहरे से गंभीरता टपक रही थी।

प्रसाद एक गणितज्ञ था। वह कोई भी समस्या गणित के मॉडल के माध्यम से हल कर सकता था। पर सरला के व्यवहार का वह कोई भी मॉडल नहीं बना पा रहा था। यदि कोई संख्या दो से विभाज्य है, तो है। इसके दो अर्थ नहीं हो सकते। दो और दो का गुणनफल चार ही हो सकता है, कभी चौबीस नहीं। समीकरण के दाहिनी ओर जितनी संख्या है बाईं ओर भी उतनी ही होनी चाहिए। वह बेचारा सरला के साथ अपना कोई समीकरण नहीं बना पा रहा था। विभाजन में शेष बच जा रहा था। गुणनफल शून्य हो जा रहा था। यहाँ तक कि एक और एक मिला कर भी वह अकेला एक ही बच जा रहा था। एक गणितज्ञ के लिए इससे बड़ी व्यथा क्या हो सकती है?

'सरो' उसने पुकारा।

सरला ने अनसुना कर दिया और वह उसके पास से होकर निकलने लगी। अपनी पुकार का कोई असर न पा कर प्रसाद बहुत क्षुब्ध हुआ। इतना कि जितनी देर में आप हलचल कहेंगे उतनी देर में उसका टेंटुआ दो बार ऊपर नीचे हो गया। उसने सरला का रास्ता रोक कर तथा अपनी खनकती आवाज का ट्रेबल बढ़ा कर कहा, 'सरला!'

'क्या है? मुझे अभी परेशान मत करो।' सरला ने कहा।

'तुम्हें मेरी बात सुननी पड़ेगी।' प्रसाद ने कहा।

'देखो प्रसाद, मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी है। जो कहना है बाद में कहना।' सरला ने कहा।

'मैं अभी कहूँगा। मैं और अधिक सहन नहीं कर सकता।'

'क्या सहन नहीं कर सकते?'

'तुम्हारा व्यवहार।'

'तो अच्छा है न। मत सहन करो। मुझसे उलझो ही नहीं।'

बेचारा गणितज्ञ यहीं परास्त हो गया। सरला ने तो बात ही समाप्त कर दी। दूसरी ओर उस प्रेमाशिष के बच्चे को उसने साफ सीधे शब्दों में चेतावनी दी थी, पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ। जो हो इस बार वह हार नहीं मानेगा। फैसला करके ही रहेगा, भले ही दशमलव के आवर्तक अंक की भाँति उसे लगे ही क्यों न रहना पड़े।

'देखो सरो,' उसने समझाते हुए कहा, 'जब तुम शेखर के साथ सिनेमा गई थीं, मैंने कुछ नहीं कहा। जब महेश तुम्हारा मित्र बना मैंने कुछ नहीं कहा। पर अब यह प्रेमाशिष मुझसे सहन नहीं होगा। मेरे मना करने के बाद भी अभी तुम उससे बातें कर रही थीं!'

'तुम होते कौन हो, मुझे मना करने वाले?' गुस्से से तिलमिला कर सरला ने कहा।

'मैं कौन होता हूँ? यानी मैं... मैं बताता हूँ मैं कौन होता हूँ। मैं तुम्हारा होने वाला पति हूँ।' लगभग चिल्लाते हुए प्रसाद ने कहा।

'तुम्हारा इतना साहस?' सरला ने कहा।

'तुम्हारे पिता जी ने मुझे चिट्ठी में ...' प्रसाद कहने लगा पर सरला ने उसकी बात बीच में काट कर कहा,

'तो जा कर पिता जी से कहो। अब फिर कभी मेरा रास्ता रोका तो मैं तुम्हारा टेंटुआ दबा दूँगी।' सरला ने कहा। वह पैर पटक कर वहाँ से जाने के लिए उद्यत हुई तो उसने देखा कि पार्टी के लगभग सभी जन उस गलियारे में उपस्थित थे। ग्लानि से उसकी आँखों में ऑसू छलक आये। वह दौड़ती हुई वहाँ से निकल गई।

उस दिन शाम को पार्क में कोई अपने घर से बाहर नहीं निकला। सभी पत्र लेखन में व्यस्त हो गये थे। यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन, वीडियो चैट आदि भविष्य की बातें थीं। लिहाजा चिट्ठी-डाकिये पर ही जोर था। पर उस दिन तो लगा था कि चिट्ठी लिखने की बीमारी पार्क में संक्रामक रोग की तरह फैल गई है। टीले वाले घर में जो घटना घटी थी, वह पार्क के इतिहास में नई थी। इतनी बड़ी घटना को अपने तक ही सीमित रखना, परले दर्जे की मूर्खता समझ कर सभी पत्र लिख रहे थे। इनमें से कुछ विशेष पत्र उल्लेखनीय हैं।

चंपा के पति ने सरला के पिता जी को लिखा कि आज ऐसी घटना हो गई है, जिसमें प्रसाद ने सरला के साथ दुर्व्यवहार किया। और यह भी लिखा कि उसकी राय में प्रसाद सरला के लिये उपयुक्त नहीं है।

चंपा ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने भी अपने शब्दों में घटना का विवरण देते हुए प्रसाद को अनुपयुक्त बताया। उसने यह भी लिखा कि शायद सरला प्रेमाशिष नाम के एक युवक को चाहती है। पर उन दोनों में किसी कारण अनबन है।

प्रसाद ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने लिखा कि सरला ने सरेआम उसके साथ दुर्व्यवहार किया है। उसने यह भी लिखा कि जब दोनों परिवारों में यह बात कई सालों से मालूम है कि सरला की शादी प्रसाद के साथ होने वाली है तो सरला का आचरण अच्छा होना चाहिए था। उसने मर्यादा का उल्लंघन करके महेश, शेखर आदि व्यक्तियों के साथ मित्रता बढ़ाई। अति तो उसने प्रेमाशिष नाम के व्यक्ति के साथ की। सब कुछ जानते हुए भी उन दोनों में अँगूठियों का आदान प्रदान हुआ। इतना होने के बावजूद वह सरला से शादी करने को तैयार है बशर्ते वह भविष्य में ऐसी हरकतें न करने का वादा करे।

प्रेमाशिष ने सरला को पत्र लिखा। उसने लिखा कि वह यानी प्रेमाशिष समझ सकता है कि आज की घटना से उसे यानी सरला को कितना कष्ट पहुँचा होगा। उसे यानी प्रेमाशिष को यह जान कर प्रसन्नता हुई कि उसके यानी सरला के और प्रसाद के बीच कुछ नहीं है। वह प्रसाद की बात पर कुछ टिप्पणी नहीं करना चाहता है, परन्तु यह जान कर उसे आश्चर्य अवश्य हुआ कि सरला के जीवन में उसके यानी प्रेमाशिष के आने के पहले शेखर और महेश नाम के व्यक्ति आ चुके हैं। यह बात उसे अवश्य आश्चर्य में डालती है कि अपने भूतकाल में न झाँकते हुए वह यानी सरला, कैसे प्रेमाशिष के भूतकाल में झाँक कर उसे दोषी ठहरा सकती है। उसे विश्वास है कि अभी शेखर या महेश का महत्व कुछ भी नहीं है। वह समझ सकता है, पर सरला ऐसी समझदार लड़की यह समझाने पर भी क्यों नहीं समझती कि निशा या तारा वाले संबंधों में न कभी दम था और न रहेगा। इस जीवन की उसकी एक ही चाहत है और वह है सदानंदजी की छोटी लड़की, सरला। उसके यानी प्रेमाशिष के इतना लिखने के बावजूद वह यानी सरला अड़ियल टट्टू की तरह अपनी बेवकूफी पर अड़ी रहे तो वह और कुछ नहीं कर सकता है। बस, अपना बचा खुचा जीवन उसी की यानी सरला की याद में बिता देगा।

सरला के पिता जी समझदार इनसान थे। उन्होंने दुनिया देख रखी थी। उन सब पत्रों से जो उनके नाम लिखे गये थे, उन्होने कुछ छाना और कुछ बीना। सरला की माँ से मिलने से पहले का अपना जामाना याद किया। प्रेमाशिष के संबंध में छानबीन की। पूरी तरह से लैस हो कर वे पार्क पहुँचे। उन्होंने चंपा के घर में एक विशाल आयोजन किया और प्रेम और सरला की सगाई की घोषणा कर दी।

इस बीच सरला ने कई बार प्रेम से मिलना चाहा था, पर हर बार झिझक का रुक गई थी। उसके पिताजी ने सब राहें आसान कर दी
थीं, उसके लिये भी और प्रेमाशिष के लिये भी।

यह कहना गलत होगा कि प्रेम पर उसका शक जाता रहा। हाँ, शक के शोलों को समझदारी की राख ने अच्छी तरह ढक लिया था। फिर प्यार तो था ही।

समयोपरांत दोनों की शादी हो गई। मदन और प्रेम का साझेदारी वाला व्यापार भी चल निकला। प्रेम ने वहीं पार्क में घर बना लिया। आजकल के मापदण्डों के विपरीत सरला और शीला में बहुत घनिष्ठता हो गई। दोनों परिवार सुखपूर्वक रहने लगे।





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